स्वयं
सहायता समूह, लघु ऋण एवं
महिला सशक्तिकरण
- एक अध्ययन
शशि
पाण्डेय
अतिथि प्रवक्ता, समाज शास्त्रए एस0एस0 खन्ना महिला महाविद्यालय, इलाहाबाद
*Corresponding Author E-mail: pandeyshashi09@gmail.com
ABSTRACT:
स्वंय सहायता समूह एक ऐसा माध्यम है जिसकी सहायता से महिलाओं ने एक नई पहचान बनाई है। इसके साथ ही स्वंय सहायता समूह ने समूह की महिलाओं को अन्य महिलाओं के साथ अपने सम्बन्धों को मजबूत करने तथा एक दूसरे की मदद करते हुए अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने मे विशेष योगदान दिया है। अब तक हुए विभिन्न प्रकार के अध्ययन इस बात को इंगित करते है कि समूह बनने के बाद तथा इसकी सदस्य बनने के बाद महिलाओं की सामाजिक पूंजी (कल्चरल कैपिटल) में वृद्वि हुई है अतः प्रस्तुत पेपर स्वंय सहायता समूह बनने के बाद महिलाओं के जीवन मे आये परिवर्तनों को समझनें का प्रयास करेगा जोकि साक्षात्कार तथा अवलोकन पर आधारित होगा।
KEYWORDS: स्वंय सहायता समूह, महिला एंव लघु ऋण।
1 प्रस्तावना-
भारत एक ग्रामीण देश है जहाॅं लगभग 70 प्रतिशत लोक कृषि कार्यों से जुडे़ हैं। कृषि कार्यों के अतिरिक्त इनके पास अन्य कोई व्यवसाय नहीं है और न ही आय के अन्य साधन। खेती का कार्य साल भर में इनको 3-4 महीने ही मिलता है, इसलिए शेष महीनों में पर्याप्त आय जुटाने के लिए इन्हें कई अन्य प्रयत्न करने पड़ते हैं और आवश्यकता पड़ने पर इन्हें अपनी जमीनों और गहनों को गिरवी रखना पड़ता है, जिन्हें बाद में छुड़ाना इनके लिए अत्यधिक कठिन होता है। इस स्थिति में पुरुष वर्ग तो शहरों में मजदूरी करने लगता है किन्तु महिला के लिए यह एक संकट की घड़ी होती है, जिसमें न तो उसे खेतों पर काम मिलता है और न ही आजीविका चलाने के अन्य साधन।(शर्मा, 2013)
इस दिशा में स्वयं सहायता समूह महिला सशक्तिकरण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं जिसमें बांग्लादेश के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मुहम्मद युनुस का प्रयास उल्लेखनीय रहा है। इन्होंने 1970 से ही लघुवित्त आन्दोलन की शुरुआत की थी जिसके तहत गरीबों, विशेषकर औरतों को बिना किसी शर्त के ऋण देने की व्यवस्था की गयी और आज लघुवित्त आंदोलन विश्व के 7 हजार संस्थाओं द्वारा चलाया जा रहा है, जिससे लगभग 1 करोड़ 6 लाख लोगों को रोजगार दिया जा चुका है। (श्रीवास्तव, 2008) वास्तव में स्वयं सहायता समूह गाॅंव के ब्यक्तियों का एक ऐसा संगठन है जो अपनी इच्छा से संगठित होकर, नियमित रूप से थोड़ी-थोड़ी बचत कर सामूहिक निधि में जमा करते हैं तथा जिसका उपयोग सदस्यों की आकस्मिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए किया जाता है। इस प्रकार समूह के सदस्य हफ्ते अथवा महीने में एक बार बैठक कर विभिन्न विषयों पर चर्चा कर, एक दूसरे की समस्याओं का समाधान करते हैं, जिससे ये महिलायें गरीबी, बेरोजगारी तथा निरक्षरता के चक्रव्यूह से निकलकर सशक्तिकरण की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं और न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक एवं राजनैतिक आयामों पर भी सशक्तिकरण की ओर अग्रसर हैं। (गुप्ता एवं पंथी, 2013)
इस प्रकार प्रत्येक समूह अपने कार्यों को सुचारु रूप से चलाने के लिए कुछ नियम बनाते हैं, जैसे-समूह की नियमित मीटिंग होना तथा प्रत्येक सदस्य का मीटिंग में उपस्थित होना। मीटिंग में अनुपस्थित होने अथवा समय से ऋण न जमा करने पर अनुपस्थित सदस्यों द्वारा पाॅंच रूपये दण्ड के रूप में जमा करना आदि। अत़ः नियमों के आधार पर समूह का सफलतापूर्वक संचालन किया जाता है और प्रत्येक सदस्य पर मासिक बचत के लिए सामूहिक दबाव के माध्यम से बचत को प्रोत्साहित किया जाता है, इसके अतिरिक्त अपनी वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ये समूह किसी सरकारी अथवा गैर सरकारी संगठन से जुड़कर अपने व्यवसायिक क्रियाओं को आगे बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयास करते रहते हैं। एक अन्य अध्ययन जिसमें पाया गया कि महिला स्वयं सहायता समूह को सहबैंक सम्बद्धता कार्यक्रम के तहत तीन लाख तक के ऋणों पर ब्याज सहायता देकर इन्हें सात प्रतिशत की वार्षिंक दर पर ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है (कुरुक्षेत्र-जुलाई,2013)।
स्वयं सहायता समूह के माध्यम से महिलाओं के नेटवर्क में भी बढ़ोत्तरी हो रही है। अभी तक जो महिलायें घर के कामों तक सीमित थीं, वो आज बाहर निकलकर सामूहिक स्तर पर विभिन्न आर्थिंक क्रियाओं में संलग्न हैं। इलाहाबाद के एक गाॅंव हथिगहाॅं- जहाॅं कई महिला स्वयं सहायता समूह में सक्रिय हैं, सामूहिक स्तर पर चिप्स, पापड़, अचार, मुरब्बा आदि का निर्माण कर बाजार में बेंचकर अतिरिक्त आय के सृजन का प्रयास किया, किन्तु बाद में प्रशिक्षण न मिलने के कारण इन महिलाओं ने इस व्यवसाय को छोड़कर भैंस पालन व्यवसाय को अपनाया तथा दूध बंेचकर परिवार की आय में वृद्धि की और आर्थिंक रूप से आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाया, जो महिला सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण आयाम है।
इस प्रकार स्वयं सहायता समूहों के निष्पादन से सम्बन्धित किये गये विभिन्न सर्वेक्षणों में यह तथ्य उभरकार सामने आया है कि स्वयं सहायता समूहों को लघु ऋण प्रदान करने से ग्रामीण महिलाओं की भैातिक गतिशीलता, निर्णय के अधिकारों में वृद्धि, सौदा शक्ति तथा विभिन्न स्तरों पर समस्या समाधान करने की शक्ति में वृद्धि होने के कारण ग्रामीण विकास प्रक्रिया में उनका योगदान उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है। इसी को देखते हुए केन्द्र एवं राज्य सरकार द्वारा इनके विकास के निरन्तर प्रयास किये जा रहे हैं। सरकार के इस प्रयास की सार्थकता भी सामने आ रही है कि इसी गाॅंव की महिलायें घर के बाहर निकलकर बैंक, ब्लाक, हास्पिटल तथा बाजार के कार्यों को स्वयं कर रही हैं और विभिन्न व्यवसायों को कुशलता पूर्वक कर यह सिद्ध कर चुकी हैं कि मात्र वे घर के कामों में ही कुशल नहीं, बल्कि सामुदायिक स्तर पर भी विभिन्न आर्थिक क्रियाओं को करने में भी निपुण हैं। इस प्रकार महिलाओं द्वारा महिला सशक्तिकरण का यह प्रयास सराहनीय है।
2 स्वयं सहायता समूह का उद्देश्य-
स्वयं सहायता समूह का उद्देश्य ग्रामीण निर्धनों, मुख्य रूप से महिलाओं को लघु ऋण उपलब्ध कराना है तथा इसके साथ ही साथ बैंकिंग गतिविधियों के साथ जोड़कर बचत तथा महिलाओं में आपसी सहयोग को बढ़ावा देना है। इसके अतिरिक्त इसका प्रमुख उद्देश्य महिलाओं में समानता तथा सम्बद्धता को विकसित करना, आत्म विश्वास बढ़ाना, आत्म निर्भरता बढ़ाना तथा उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाना है, जिससे वे व्यक्तिगत स्तर पर सशक्त होने के साथ-साथ सामूहिक स्तर पर भी सशक्त हो सकें और अपने अधिकारों के लिए सामने आ सकें।
3 अध्ययन क्षेत्र तथा शोध प्रविधि-
यह अध्ययन इलाहाबाद के तीन गाॅंव क्रमशः हथगहाॅं, टिकरी तथा रामपुर के अध्ययन क्षेत्र पर आधारित है। वर्तमान में ऐसा पाया गया कि ये तीनों गाॅंवों में महिला स्वयं सहायता समूह कार्यरत है, जो कि कौड़िहार ब्लाक द्वारा संचालित होकर हथिगहाॅं ग्रामीण बैंक से वित्त प्राप्त करते हैं जिसके तहत इन समूहों ने पशुपालन व्यवसाय को अपनाते हुए अपने आय के साधन को सृजित किया। अतः इन समूहों को अपने अध्ययन के लिए ”सैम्पल” के रूप में चुना तथा सक्षात्कार एवं अवलोकन पद्धति द्वारा तथ्यों का संकलन किया गया
4 स्वयं सहायता समूह का संचालन-
समूह के सुचारु रूप से संचालन के लिए प्रत्येक समूह अपने सदस्यों में से ही तीन प्रतिनिधि-अध्यक्ष, कोषाध्यक्ष तथा सचिव की नियुक्ति करता है, ताकि समूह क्रियाविधि, सुचारु रूप से चल सके। पदाधिकारियों को चुनने का आधार मुख्यतः शिक्षा तथा अत्मविश्वास होता है, ताकि समूह में हिसाब-किताब का काम ये स्वयं कर सकें। प्रायः सुविधादाता द्वारा कभी-कभी इनको समूह चलाने की ट््रेनिंग भी दी जाती है। प्रत्येक महीने समूह की नियमित मीटिंग होती है, जो कि किसी सार्वजनिक स्थान अथवा प्रत्येक सदस्य के घर बारी-बारी से होती है। समूह की मीटिंग में प्रत्येक सदस्य का उपस्थित होना अनिवार्य होता है, अथवा अनुपस्थित होने की पूर्व सूचना सदस्य द्वारा समूह में उपलब्ध करायी जाती है, जिससे समूह के कार्यों का बेहतर नियोजन हो सके। कभी-कभी समूह के सदस्यों द्वारा अपने पड़ोसी से समूह में बचत का पैसा भेज दिया जाता है, जो कि यह इंगित करता है। समूह बनने के बाद महिलाओं का ”नाइबरहुड रिलेशन” भी मजबूत हुआ है। मीटिंग के दौरान प्रायः महिलाओं द्वारा आपस में विभिन्न विषयों पर चर्चा होती है, जैस-ऋण के लेन-देन, बचत, नये सदस्यों के शामिल होने की प्रक्रिया, गाॅंव की समस्या तथा समाधान, पर्यावरणीय समस्या, स्वास्थ्य समस्या, बच्चों की शिक्षा, राजनैतिक भागेदारी, ऋण का उपयोग तथा बचत के तरीके आदि। समूह के सदस्य इस बात के लिए एक दूसरे को प्रोत्साहित भी करते हैं कि वे किस प्रकार छोटी-छोटी बचत कर एक बड़ी राशि समूह से प्राप्त कर सकते हैं।
इस प्रकार यह पाया गया कि समूह नियमित मासिक मीटिंग के अतिरिक्त समूह कभी-कभी आकस्मिक मीटिंग भी करता है, जिसका प्रमुख उद्देश्य महिलाओं को त्वरित ऋण उपलब्ध कराना है, जिसके लिए ये अपने बचत के पैसे से आपस में लेन-देन करती हैं। अतिरिक्त बचे हुए पैसे को समूह कार्यवाही रजिस्टर पर अंकित कर, नजदीक के किसी बैंक, जहाॅं समूह का सामूहिक खाता होता है जमा किया जाता है और बैंक इन्हें इनकी बचत पर 02 प्रतिशत ब्याज भी देता है। इसके अतिरिक्त समूह की महिलाओं को किसी व्यवसाय को करने के लिए बैंक द्वारा सब्सिडी उपलब्ध कराई जाती है, जिसपर कोई ब्याज नहीं लिया जाता है। इस प्रकार महिलायें समूह में आपस में लेन-देन कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं, जो कि न केवल उनको आत्मनिर्भर बनाता है बल्कि साहूकारों के चंगुल से भी बचाता है।
निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि समूह की क्रियाओं में भाग लेकर महिलाएं विभिन्न कार्यों से जुड़कर विकास के नये आयाम से जुड़ गयी हैं तथा समूह के स्तर पर नेतृत्व करने के साथ-साथ परिवार एवं समुदाय के स्तर पर नेतृत्व करने की क्षमता भी उभरी है। महिला सशक्तिकरण का प्राथमिक उद्देश्य ही यह है कि उनको अपने अधिकारों के प्रति सशक्त किया जाय और परिवार में निर्णय के स्तर पर ज्यादा से ज्यादा भागीदारी बढ़ाई जाये।
इस प्रकार ग्रमीण महिलाओं को स्वावलम्बी और आत्मनिर्भर बनाने में स्वयं सहायता समूह महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, जिसके अन्तर्गत स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसके तहत अब तक 30 हजार से ज्यादा स्वयं सहायता समूहों का गठन किया जा चुका है। विभिन्न तथ्यों से स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं, कि इन्हीं समूहों के माध्यम से महिलाओं पर किये गये घरेलू हिंसा तथा शोषण पर प्रभावशाली ढंग से रोक लगायी गई है, जिससे समाज में महिलाओं की स्थिति में कुछ हद तक सुधार भी आया है। अतः स्वयं सहायता समूह ने महिलाओं को विकास की मुख्य धारा से जोड़कर उनके सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन कर सशक्तिकरण की दिशा की ओर उन्मुख किया है, जिससे ग्रामीण महिलाएॅं अपनी एक विशेष पहचान तो बना ही रही हैं, साथ ही साथ गाॅंव के विकास में अहम भूमिका भी निभा रही हैंे, जो कि सराहनीय है।
4 सन्दर्भ-
1- बुर्रा एन, देशमुख रानाडिव, जाॅय एण्ड मुर्थी के0 माइक्रों के्रडिट पावर्टी एण्ड इम्पावरमेन्ट, सेज पब्लिकेशन, नई दिल्ली-2005
2- यादव चन्द्रभानः महिलाओं की सफलता का सशक्त माध्यम स्वयं सहायता समूह, कुरुक्षेत्र-जुलाई, 2013
3- पार्थसारथी एस0 के0 अवेयरनेस, ऐसेस, एजेन्सीः इक्सपीरियंसेस आफ स्वयं शिक्षण प्रयोग इन माइक्रो फाइनेन्स एण्ड वूमेन इम्पावरमेन्ट-2005
4- लक्ष्मी रामचन्द्र एण्ड पार्टीः सेल्फ हेल्प ग्रुप इन बेलारीः माइक्रो फाइनेन्स एण्ड वूमेन इम्पावरमेन्ट, द जनरल आफ फैमिली वेलफेयर, वोल्यूम-55, नं0-2-2009क्ष्
5- शर्मा, डी0, ”शांति मैत्री मिशन संस्थान, मरुस्थलीय ग्रामीण विकास का पुरोधा, कुरुक्षेत्र, जुलाई-2013
6- एन0डी0 जार्ज, भारत में लघुवित्त, मुद्दे और रणनीतियाॅं, योजना, जनवरी-2008, पेज, 12-17
7- एम0 श्रीवास्तव, मुहम्मद युनुस का योगदान, योजना, 2008, पेज-18
8- गुप्ता एवं एस0, स्वयं सहायता समूह के द्वारा ग्रामीण भारत का विकास, कुरुक्षेत्र, जुलाई-2013, पेज, 23-26
Received on 21.03.2016 Modified on 11.05.2016
Accepted on 17.05.2016 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences 4(2): April- June, 2016; Page 64-68